
भारत में सौर ऊर्जा (Solar Energy) के तेज़ी से बढ़ते उपयोग ने देश को नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में नई ऊँचाइयाँ दी हैं। छतों पर सोलर पैनल, बड़े सोलर पार्क और गांवों तक पहुंचते मिनी-ग्रिड सिस्टम ये सभी मिलकर भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भर बना रहे हैं। लेकिन इस क्रांति के साथ एक नई चुनौती भी जन्म ले रही है सोलर पैनलों से निकलने वाला ‘सोलर वेस्ट’ (Solar Waste)।
अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत में लगभग 6 लाख टन और 2047 तक यह कचरा 1.1 करोड़ टन से अधिक हो सकता है। यह मात्रा सिर्फ एक पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक नए उद्योग के जन्म का संकेत भी है, यदि इसे सही तरीके से संभाला गया।
सरकार की रणनीति: नियमों से जिम्मेदारी तक
भारत सरकार ने इस उभरती चुनौती को समय रहते पहचान लिया है। सोलर वेस्ट को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार ने ‘ई-कचरा प्रबंधन नियम 2022’ के तहत सोलर फोटोवोल्टिक (PV) मॉड्यूल और सेल्स को भी शामिल कर लिया है। यह कदम भारत को सोलर वेस्ट के आने वाले संकट से बचाने की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है।
नियमों के तहत सौर पैनल बनाने वाली कंपनियों पर अब स्पष्ट जिम्मेदारी तय की गई है। 2034-35 तक वे अपने पुराने पैनलों या उनसे उत्पन्न कचरे को सुरक्षित रूप से संग्रहित करने के लिए बाध्य होंगी, जैसा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने तय किया है।
इसके अलावा ‘विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व’ (EPR) नीति भी लागू की गई है, जिसके तहत निर्माता को अपने उत्पादों के जीवनकाल समाप्त होने पर उनके संग्रहण और पुनर्चक्रण की पूरी जिम्मेदारी निभानी होगी। कंपनियों को सरकारी पोर्टल पर पंजीकरण और सालाना रिपोर्टिंग भी करनी होगी ताकि यह निगरानी की जा सके कि बाजार में डाले गए और वापस लिए गए पैनलों की मात्रा कितनी है।
रिसाइक्लिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर का नया दौर
भारत अब सिर्फ नियम नहीं बना रहा, बल्कि सोलर वेस्ट प्रबंधन के लिए ज़मीनी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है। दिसंबर 2025 में, जैक्सन इंजीनियर्स (Jakson Engineers) ने घोषणा की कि वह भारत का पहला हाई-टेक सोलर पैनल रीसाइक्लिंग प्लांट स्थापित करेगा। इस प्लांट की क्षमता हर साल 13,500 टन तक कचरे को प्रोसेस करने की होगी।
इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर सौर उद्योग की दिग्गज कंपनी ‘फर्स्ट सोलर’ ने चेन्नई में इन-हाउस रीसाइक्लिंग यूनिट शुरू की है। इसका मकसद है निर्माण और निस्तारण दोनों को एक ही प्रणाली में जोड़ना, ताकि सौर उद्योग पूरी तरह सर्कुलर इकोनॉमी मॉड्यूल की दिशा में बढ़ सके।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत की सोलर ग्रोथ इसी गति से जारी रही, तो 2047 तक लगभग 300 रीसाइक्लिंग केंद्रों का नेटवर्क बनाना पड़ेगा। इसे विकसित करने में लगभग 478 मिलियन डॉलर का निवेश अपेक्षित है। यह न सिर्फ पर्यावरण के लिहाज़ से ज़रूरी होगा, बल्कि हज़ारों नई नौकरियाँ और निवेश के अवसर भी पैदा करेगा।
सोलर वेस्ट से खजाने तक की यात्रा
कई लोग सोलर वेस्ट को सिर्फ ‘कचरा’ मान सकते हैं, लेकिन असल में यह एक कीमती संसाधन है। पुराने पैनलों के रीसाइक्लिंग से कांच, एल्यूमीनियम, सिलिकॉन, तांबा और चांदी जैसी मूल्यवान धातुएँ दोबारा निकाली जा सकती हैं। यह प्रक्रिया न केवल पर्यावरण को सुरक्षित रखती है, बल्कि नई इकॉनॉमिक चेन भी बनाती है।
एक हालिया अध्ययन के अनुसार, 2047 तक सोलर रीसाइक्लिंग से करीब ₹3,700 करोड़ का बाजार अवसर बन सकता है। इतना ही नहीं, यह भारत की कुल कच्चे माल की मांग का लगभग 38% तक हिस्सा खुद से पूरा कर सकता है। यह आंकड़े बताते हैं कि आने वाले दो दशकों में सोलर वेस्ट प्रबंधन सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूती की रणनीति भी बनने वाला है।







