
कभी सीमित उपयोग तक सिमटी रहने वाली सोलर एनर्जी-Solar Energy आज वैश्विक Renewable Energy ट्रांजिशन की सबसे मजबूत धुरी बन चुकी है। बीते एक दशक में सोलर मॉड्यूल की कीमतों में 90% से अधिक की गिरावट ने इस सेक्टर की तस्वीर ही बदल दी है।
2010 के बाद से लागत में आई इस ऐतिहासिक कमी ने सोलर फोटोवोल्टिक को दुनिया के कई देशों में सबसे सस्ता नया बिजली उत्पादन स्रोत बना दिया है।
भारत में सोलर पावर की मजबूत पकड़
भारत की बात करें तो यहां सरकार के आक्रामक ग्रीन एनर्जी लक्ष्यों और रिकॉर्ड स्तर पर हो रही सोलर पैनल इंस्टॉलेशन ने नए कीर्तिमान बनाए हैं।
वर्तमान में भारत की कुल Renewable Energy Capacity में 47% हिस्सेदारी सोलर एनर्जी की है, जो यह साबित करता है कि आने वाले दशकों में भी सोलर पावर देश की बिजली व्यवस्था की नींव बनी रहेगी।
निवेशकों के लिए छुपा हुआ विरोधाभास
हालांकि, सोलर एनर्जी की यह शानदार ग्रोथ निवेशकों के लिए उतनी सीधी नहीं रही। पहले जहां समीकरण था – ज्यादा पैनल लगाओ, ज्यादा कमाई करो, अब वह पूरी तरह टूट चुका है।
सोलर पैनल मैन्युफैक्चरिंग में आई ओवरकैपेसिटी ने खासकर एशिया और आने वाले पांच वर्षों में भारत में सप्लाई ग्लट पैदा कर दिया है। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है और मॉड्यूल प्राइस रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गए हैं।
नतीजतन, पारंपरिक सोलर प्रोजेक्ट डेवलपर्स के प्रॉफिट मार्जिन बुरी तरह दबाव में आ गए हैं।
पॉलिसी रिस्क और बदलता रेगुलेटरी माहौल
इसके साथ ही पावर टैरिफ और बिजली खरीद समझौतों से जुड़े रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में बदलाव ने लॉन्ग टर्म प्रोजेक्ट्स पर अनिश्चितता बढ़ा दी है।
कुछ बड़े वैश्विक बाजारों जैसे अमेरिका और चीन में सरकारी सब्सिडी और समर्थन में कटौती भी देखी जा रही है। हालांकि, इसके बावजूद सोलर एनर्जी की दीर्घकालिक मांग पर कोई बड़ा सवाल नहीं है।
सोलर सेक्टर के तीन बड़े स्ट्रक्चरल फैक्टर
लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए सोलर सेक्टर को समझने के तीन अहम पहलू हैं:
पहला, सोलर पैनल की लागत बड़े पैमाने पर उत्पादन के साथ तेजी से गिरती है। ऐसे में जो कंपनियां केवल पैनल प्राइसिंग पर निर्भर हैं, वे लंबे समय तक वैल्यू क्रिएट नहीं कर पाएंगी।
दूसरा, सोलर पावर का मार्जिनल फ्यूल कॉस्ट लगभग शून्य है। एक बार पैनल लग जाने के बाद अतिरिक्त बिजली उत्पादन की लागत नहीं के बराबर होती है। इससे छोटे प्राइवेट प्लेयर्स भी बड़े संस्थागत खिलाड़ियों को टक्कर दे सकते हैं।
तीसरा, सोलर पैनल मॉड्यूलर होते हैं और फिक्स्ड प्राइस पर आसानी से उपलब्ध हैं, जिससे डिसेंट्रलाइज्ड ग्रिड को बढ़ावा मिलता है। हालांकि रिटेल सोलर डिमांड अभी भी सरकारी इंसेंटिव पर निर्भर है।
असली गेमचेंजर: Battery Energy Storage System (BESS)
सोलर पावर की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी इंटरमिटेंट नेचर है – यानी सूरज न होने पर उत्पादन नहीं। यही वजह है कि भविष्य में ग्रोथ की रफ्तार सप्लाई से ज्यादा पावर स्टोरेज पर निर्भर करेगी।
यहीं पर Battery Energy Storage System-BESS की एंट्री होती है। BESS केवल बैटरी नहीं, बल्कि ऐसा सिस्टम है जो अतिरिक्त सोलर बिजली को स्टोर कर जरूरत के समय इस्तेमाल करने की सुविधा देता है।
यह ग्रिड स्टेबिलिटी, पीक डिमांड मैनेजमेंट, इंडस्ट्रियल बैकअप और कॉस्ट सेविंग में अहम भूमिका निभाता है। ऑटोमेटेड फैक्ट्रियों के लिए यह उत्पादन बाधित होने से बचाने का मजबूत समाधान है।
सोलर से बेहतर निवेश विकल्प बनता BESS
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में BESS कंपनियां सोलर पैनल मैन्युफैक्चरर्स से बेहतर प्रॉक्सी प्ले साबित हो सकती हैं। भारत में कई नामी और उभरती कंपनियां इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही हैं।
Tata Power अपनी BESS क्षमताओं का विस्तार कर रही है ताकि रिन्यूएबल इंटीग्रेशन और 24×7 पावर सप्लाई सुनिश्चित की जा सके। इसकी सब्सिडियरी Tata Power Renewable Energy ने NHPC के साथ पहला BESPA साइन किया है। यह प्रोजेक्ट केरल में 125 MW / 500 MWh स्टैंडअलोन बैटरी स्टोरेज क्षमता विकसित करने से जुड़ा है, जिसे Viability Gap Funding का समर्थन प्राप्त है।
Amara Raja और Jupiter Wagons की रणनीतिक छलांग
Amara Raja Energy, जो पहले लीड-एसिड बैटरियों में अग्रणी थी, अब Lithium-ion और Energy Storage Solutions पर फोकस कर रही है। कंपनी का लक्ष्य होम, कमर्शियल, इंडस्ट्रियल और यूटिलिटी – सभी सेगमेंट को कवर करना है। वहीं, Jupiter Wagons जैसे अपेक्षाकृत कम चर्चित नाम भी BESS और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में उतर चुके हैं। कंपनी को पहले ही बैटरी स्टोरेज सिस्टम के ऑर्डर मिल चुके हैं और FY28 तक रेवेन्यू लगभग दोगुना करने की योजना है।







