
भारत अब सौर ऊर्जा के क्षेत्र में एक नया अध्याय लिख रहा है। पहले जहाँ सोलर पैनल्स के लिए जमीन खोजने की चुनौती सामने आती थी, अब वही काम झीलों और डैम पर किया जा रहा है। इस नयी तकनीक को “फ्लोटिंग सोलर पावर” या “फ्लोटोवोल्टाइक्स” कहा जाता है। यानी सोलर पैनल अब जल पर तैरते हैं और वहीं से स्वच्छ ऊर्जा पैदा करते हैं।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
इस तकनीक में सोलर पैनल्स को विशेष फ्लोटिंग स्ट्रक्चर पर लगाया जाता है जो पानी पर स्थिर रहते हैं। ये पैनल सूरज की किरणों को उसी तरह कैप्चर करते हैं जैसे जमीन पर लगे पैनल करते हैं, लेकिन पानी के ऊपर होने के कारण ये ज्यादा कुशल बन जाते हैं। पानी का ठंडा वातावरण पैनल्स को ओवरहीट होने से बचाता है और उनकी कार्यक्षमता बढ़ा देता है।
बिजली उत्पादन में बढ़ी क्षमता
विशेषज्ञों के मुताबिक, फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट्स जमीन पर लगे पैनल्स से करीब 5-10% ज्यादा बिजली बना सकते हैं। इसका कारण है कि जलाशयों के ऊपर तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है जिससे पैनल्स की ऊर्जा रूपांतरण क्षमता बेहतर होती है। साथ ही, पानी की सतह पर धूल कम होती है, जिससे पैनल्स को लगातार साफ रखने की जरूरत नहीं पड़ती।
देश के प्रमुख फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट्स
भारत में कई बड़े फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट्स अब हकीकत बन चुके हैं।
- रामागुंडम, तेलंगाना: NTPC द्वारा विकसित 100 मेगावाट का फ्लोटिंग प्लांट देश का सबसे बड़ा चालू प्रोजेक्ट है।
- ओंकारेश्वर बांध, मध्य प्रदेश: नर्मदा नदी पर 600 मेगावाट क्षमता वाला प्लांट दुनिया का सबसे बड़ा बनने जा रहा है, जिसकी शुरुआत 2026 तक होने की उम्मीद है।
- कायमकुलम, केरल: दक्षिण भारत में यह प्रोजेक्ट पहले से ही सफलतापूर्वक संचालन में है और बिजली उत्पादन में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।
क्यों है यह एक बेहतर विकल्प?
फ्लोटिंग सोलर प्लांट्स केवल बिजली ही नहीं पैदा करते, बल्कि कई पर्यावरणीय लाभ भी देते हैं। खेतों और शहरों की भूमि बचती है, जिससे कृषि पर असर नहीं पड़ता। इसके अलावा, पैनल्स पानी की सतह को ढक लेते हैं जिससे वाष्पीकरण कम होता है और जलाशयों में पानी लंबे समय तक बना रहता है। यह तकनीक पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल है क्योंकि इसमें पेड़ काटने या मिट्टी की खुदाई करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
मुख्य चुनौतियाँ
हर तकनीक की तरह इसमें भी कुछ चुनौतियाँ हैं। फ्लोटिंग स्ट्रक्चर की लागत जमीन आधारित सोलर सिस्टम से थोड़ी अधिक होती है, और लगातार पानी में संपर्क के कारण उपकरणों को जंग से बचाने के लिए विशेष सामग्री की जरूरत पड़ती है। लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद, यह परियोजनाएँ भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा का रास्ता साफ कर रही हैं।
भविष्य की दिशा
भारत सरकार ने 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य तय किया है। इस दिशा में फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट्स एक बड़ा योगदान देने वाले हैं। पानी और सूरज की संयुक्त शक्ति के साथ, भारत न सिर्फ अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करेगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक मजबूत कदम उठाएगा।






