
भारत जहां एक ओर दुनिया की सौर ऊर्जा महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, वहीं दूसरी ओर एक अदृश्य चुनौती तेजी से पांव पसार रही है—’सोलर वेस्ट’ (Solar Waste)। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (CEEW) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत में सौर कचरे की मात्रा 2040 तक बढ़कर 6 लाख टन होने का अनुमान है, यह मात्रा 2050 तक 19,000 किलोटन तक पहुंच सकती है, जो पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है।
संकट की गहराई: क्यों है यह चिंता का विषय?
भारत के 5 प्रमुख राज्यों—राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु—से इस कचरे का लगभग 67% हिस्सा उत्पन्न होने की संभावना है, सोलर पैनलों में सिलिकॉन, तांबा, चांदी और हानिकारक धातुएं जैसे कैडमियम और टेल्यूरियम होती हैं। यदि इनका सही निपटान नहीं हुआ, तो ये मिट्टी और भूजल को जहरीला बना सकते हैं।
सरकार का ‘रिसाइक्लिंग प्लान’ और 2025 के नए दिशानिर्देश
इस संकट से निपटने के लिए सरकार ने ई-कचरा (प्रबंधन) नियम, 2022 के तहत सोलर पैनलों को शामिल किया है और मई 2025 में CPCB ने इसके लिए कड़े दिशानिर्देश जारी किए हैं:
- उत्पादकों (Producers) को निर्देश दिया गया है कि वे 2034-35 तक सोलर कचरे को सुरक्षित स्टोर करें। इसके लिए हवादार और ‘नॉन-लीचेबल’ फर्श वाले विशेष गोदामों की आवश्यकता होगी ताकि रसायनों का रिसाव न हो।
- सोलर पैनल बनाने वाली कंपनियों की अब यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे खराब पैनलों को वापस लें और उनका सुरक्षित रिसाइक्लिंग सुनिश्चित करें।
- सोलर कचरे को केवल ढके हुए वाहनों में ही ले जाया जा सकता है और इसे खुले में फेंकना या अवैध कबाड़ियों को बेचना दंडनीय अपराध होगा।
कचरे में छिपा ‘खजाना’: ₹3,700 करोड़ का अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट एक बड़ा आर्थिक अवसर भी है, सोलर पैनलों से मूल्यवान खनिजों की रिकवरी का बाजार 2047 तक ₹3,700 करोड़ तक पहुंच सकता है।
- इन्फ्रास्ट्रक्चर: अनुमान है कि भारत को 2047 तक लगभग 300 रिसाइक्लिंग प्लांट की आवश्यकता होगी, जिससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
- सर्कुलर इकोनॉमी: सोलर कचरे को रिसाइकिल कर चांदी और सिलिकॉन जैसे खनिजों को दोबारा उपयोग में लाने से भारत की आयात पर निर्भरता कम होगी।
भारत सरकार का लक्ष्य 2026 तक सौर पार्कों के माध्यम से 40 गीगावाट क्षमता जोड़ना है, ऐसे में सोलर वेस्ट मैनेजमेंट की सफलता ही यह तय करेगी कि भारत की ‘क्लीन एनर्जी’ की क्रांति वाकई कितनी ‘ग्रीन’ रहती है, विशेषज्ञों के अनुसार, समय रहते ठोस कदम न उठाना भविष्य में एक बड़े पर्यावरणीय आपदा को जन्म दे सकता है।







