
भारत ने 2025-26 के वित्तीय वर्ष में एक ऐसा मुकाम हासिल किया है जिसने देश को वैश्विक सौर ऊर्जा मानचित्र पर नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। लंबे समय तक चीन के दबदबे वाले इस बाज़ार में अब भारत एक सशक्त प्रतिस्पर्धी और भरोसेमंद साझेदार के रूप में उभरा है। सौर मॉड्यूल्स के निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ और ‘सस्टेनेबल डेवेलपमेंट’ दोनों को नई ऊर्जा मिली है।
20 गुना बढ़ा निर्यात, विश्व मंच पर भारत की पहचान
सौर ऊर्जा क्षेत्र के लिहाज से 2025-26 भारत के लिए ऐतिहासिक रहा। पिछले कुछ वर्षों की तुलना में भारत का सोलर मॉड्यूल निर्यात 20 गुना तक बढ़ चुका है। पहले जहां भारत मुख्य रूप से घरेलू मांग पर निर्भर था, अब उसकी सौर उत्पादन इकाइयां अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं।
अमेरिकी बाजारों में चीन के आयातों पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते भारतीय मॉड्यूल्स की मांग अचानक बढ़ी है। यह अवसर भारत के लिए उस दरवाजे की तरह साबित हुआ, जिससे न केवल नए व्यापारिक रिश्ते बने बल्कि देश की निर्माण क्षमता को भी वैश्विक मान्यता मिली।
चीन से मुकाबले में भारत का नया आत्मविश्वास
कभी चीन दुनिया का लगभग 80 फीसदी सौर मॉड्यूल निर्माण करता था, लेकिन अब भारत उसकी बराबरी की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भारत सरकार की प्रोडक्ट लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना ने घरेलू उद्योगों को मजबूत पूंजी सहायता दी, जिससे नए प्लांट्स लगे और उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ी।
आज भारतीय कंपनियां न केवल मात्रा में बढ़ोतरी कर रही हैं, बल्कि गुणवत्ता के अंतरराष्ट्रीय मानक भी स्थापित कर चुकी हैं। Ministry of New and Renewable Energy (MNRE) द्वारा लागू ALMM (Approved List of Models and Manufacturers) जैसे मानकों ने भारत के सौर मॉड्यूल्स को विश्वसनीयता दी है। यही कारण है कि अमेरिका और यूरोप जैसे बाजार अब भारत को ‘विकल्प’ नहीं बल्कि ‘प्राथमिक स्रोत’ के रूप में देखने लगे हैं।
गुणवत्ता और टेक्नोलॉजी बने सफलता की कुंजी
भारत की नई पीढ़ी की सौर मॉड्यूल कंपनियां अब टेक्नोलॉजी पर विशेष जोर दे रही हैं। घरेलू निर्माता हाई-एफिशिएंसी मॉड्यूल्स बना रहे हैं जो कम सूरज या बादल वाले क्षेत्रों में भी बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं। अनुसंधान एवं विकास (R&D) के क्षेत्र में हुए निवेश और सरकारी प्रोत्साहन ने भारतीय मॉड्यूल्स को प्रतिस्पर्धा में आगे रखा है।
इस सफलता में एक और अहम कारण है वृहद पैमाने पर उत्पादन और घरेलू आपूर्ति श्रृंखला का तेजी से विकसित होना। पहले जहां सेल, इनवर्टर और ग्लास जैसी चीजें बड़े पैमाने पर चीन से आयात करनी पड़ती थीं, अब भारत स्वयं इनका निर्माण करने लगा है।
विदेशी निवेश और रोजगार में वृद्धि
सौर ऊर्जा क्षेत्र की इस सफलता ने विदेशी निवेशकों का भरोसा भी मज़बूत किया है। अमेरिका, यूरोप और जापान की कई बड़ी कंपनियों ने भारत में संयुक्त उपक्रमों (Joint Ventures) की शुरुआत की है। इसका सीधा फायदा देश के युवाओं को रोजगार के रूप में मिला है, खासकर गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में।
भारत अब सिर्फ ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में नहीं बल्कि ऊर्जा निर्यातक राष्ट्र बनने की राह पर है। इस बदलाव ने न केवल विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाया है, बल्कि भारत की “ग्रीन इकोनॉमी” को नई गति दी है।
भविष्य का लक्ष्य
भारत का अगला बड़ा लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करना है। इसमें सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा योगदान रहने वाला है। सरकार लगातार मिशन मोड में “सोलर सिटी प्रोजेक्ट्स” और “ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर्स” पर काम कर रही है।
वहीं विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में भारत न सिर्फ सौर मॉड्यूल बल्कि संपूर्ण सोलर सिस्टम समाधान (solar solutions) के निर्यातक के रूप में भी नेता बन सकता है, यानी केवल उत्पाद नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट भी।






