
भारत में सोलर ऊर्जा (Solar Energy) को लेकर तेजी से बढ़ती जागरूकता और तकनीकी विस्तार ने रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। आज हर दूसरा घर या व्यवसाय सोलर पैनल लगाने की योजना बना रहा है। लेकिन इस योजना का असली आर्थिक लाभ तब मिलता है जब उपभोक्ता सही बिलिंग प्रणाली को चुनते हैं। इस दिशा में दो प्रमुख व्यवस्थाएं—नेट मीटरिंग (Net Metering) और नेट बिलिंग (Net Billing)—महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन दोनों सिस्टम्स के फायदे और सीमाएं जानना हर सोलर उपयोगकर्ता के लिए जरूरी है।
नेट मीटरिंग: उपभोक्ता के लिए बिजली का ‘बैंक’ सिस्टम
नेट मीटरिंग प्रणाली में उपभोक्ता अपनी सोलर पैनल से उत्पन्न अतिरिक्त बिजली को ग्रिड (Grid) में भेज सकता है। इस अतिरिक्त बिजली के लिए उपभोक्ता को यूनिट के रूप में क्रेडिट (Credit) मिलता है, जिसे वह भविष्य के बिजली बिल में समायोजित कर सकता है।
उदाहरण के तौर पर, अगर कोई उपभोक्ता एक महीने में 500 यूनिट बिजली उत्पन्न करता है लेकिन खुद 400 यूनिट ही उपयोग करता है, तो 100 यूनिट ग्रिड को भेज दी जाती है। ये 100 यूनिट क्रेडिट के तौर पर उसके अकाउंट में जुड़ जाती हैं, जिसे वह अगले महीने के बिल में उपयोग कर सकता है। इसका सीधा लाभ यह है कि उपभोक्ता को ग्रिड से कम बिजली खरीदनी पड़ती है और उसका बिल न्यूनतम आता है।
नेट मीटरिंग का एक बड़ा लाभ यह भी है कि यह प्रणाली उपभोक्ताओं को बिजली उत्पादन और खपत का पारदर्शी नियंत्रण देती है। साथ ही, यह ग्रिड पर लोड कम करती है और हरित ऊर्जा को बढ़ावा देती है। भारत के कई राज्यों में इसे प्रोत्साहित करने के लिए विशेष सब्सिडी और योजनाएं चलाई जा रही हैं।
नेट बिलिंग: सीमित भुगतान, सीमित लाभ
नेट बिलिंग प्रणाली नेट मीटरिंग से भिन्न है। इसमें जब उपभोक्ता की सोलर सिस्टम अतिरिक्त बिजली उत्पन्न करती है, तो वह बिजली ग्रिड में भेजी जाती है और इसके बदले उपभोक्ता को प्रति यूनिट एक तयशुदा दर पर भुगतान किया जाता है।
हालांकि यह व्यवस्था भी सोलर उत्पादन का लाभ देती है, लेकिन यह लाभ सीमित होता है। वजह यह है कि ग्रिड को दी गई बिजली की दर खुदरा दर (Retail Rate) से काफी कम होती है, जबकि जब उपभोक्ता को बिजली खरीदनी होती है तो वह पूरी खुदरा दर चुकाता है।
जैसे मान लीजिए किसी उपभोक्ता ने 100 यूनिट अतिरिक्त बिजली ग्रिड को दी और प्रति यूनिट 3 रुपये की दर से उसे ₹300 मिले। लेकिन जब उसे ग्रिड से 100 यूनिट बिजली लेनी पड़ी, तो उसे ₹7 प्रति यूनिट की दर से ₹700 चुकाने पड़े। ऐसे में नेट बिलिंग से मिलने वाला लाभ सीमित हो जाता है और यह नेट मीटरिंग जितना प्रभावशाली साबित नहीं होता।
नेट मीटरिंग और नेट बिलिंग के बीच क्या है बड़ा फर्क?
इन दोनों प्रणालियों के बीच मुख्य अंतर आर्थिक लाभ को लेकर है। नेट मीटरिंग में उपभोक्ता को उत्पन्न अतिरिक्त बिजली का पूर्ण यूनिट क्रेडिट मिलता है, जिससे वह अपने अगले बिजली बिल को बड़ी हद तक घटा सकता है। वहीं, नेट बिलिंग में उसे सिर्फ एक फिक्स रेट पर भुगतान मिलता है, जो कमाई तो देता है पर खर्च को कम करने में सक्षम नहीं होता।
नेट मीटरिंग एक तरह से बिजली का ‘बैंक’ सिस्टम है, जहां उपभोक्ता यूनिट जमा करके भविष्य में उसका उपयोग कर सकता है। इसके विपरीत, नेट बिलिंग में वह यूनिट भविष्य में नहीं मिलती, बल्कि उसी समय कैश में भुगतान होता है। यह खासकर उन उपभोक्ताओं के लिए कम फायदेमंद होता है जिनकी खपत समय-समय पर बदलती रहती है।
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राज्यवार नीतियों में फर्क, सोलर लगाने से पहले जानें पॉलिसी
भारत में नेट मीटरिंग और नेट बिलिंग की सुविधा हर राज्य और बिजली वितरण कंपनी (DISCOM) के अनुसार अलग होती है। कई राज्यों में 10 किलोवाट (kW) तक के सोलर सिस्टम के लिए नेट मीटरिंग की अनुमति है, जबकि कुछ राज्यों में केवल नेट बिलिंग या ग्रॉस मीटरिंग की ही सुविधा है।
महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात जैसे राज्यों में नेट मीटरिंग को अपनाया गया है और वहां के उपभोक्ता इसका लाभ ले रहे हैं। वहीं, कुछ राज्य जैसे राजस्थान या पंजाब ने ग्रॉस मीटरिंग या नेट बिलिंग को अनिवार्य किया है। इसलिए किसी भी सोलर सिस्टम को स्थापित करने से पहले राज्य की नीति की जानकारी लेना जरूरी है ताकि अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सके।
निष्कर्ष: उपभोक्ता के लिए कौन है ज्यादा लाभकारी विकल्प?
अगर बात करें सीधे लाभ की तो नेट मीटरिंग सोलर ऊर्जा उपयोगकर्ताओं के लिए कहीं अधिक फायदे का सौदा साबित होती है। यह न केवल उपभोक्ता के बिजली बिल को घटाती है बल्कि उसकी ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा देती है।
नेट बिलिंग भी एक विकल्प है, लेकिन यह उपभोक्ता को उतना आर्थिक लाभ नहीं देता जितना नेट मीटरिंग देती है। हालांकि, किस प्रणाली का चयन करना है यह पूरी तरह से राज्य की नीति, DISCOM की व्यवस्था और उपभोक्ता की ऊर्जा जरूरतों पर निर्भर करता है।
लेकिन अगर विकल्प मौजूद हो, तो नेट मीटरिंग न केवल आर्थिक रूप से बेहतर है बल्कि पर्यावरण के लिए भी ज्यादा फायदेमंद है। यही वजह है कि यह प्रणाली आने वाले वर्षों में और अधिक लोकप्रिय होती जा रही है।