
ऊर्जा की दुनिया में एक ऐसी क्रांतिकारी खोज हुई है जो भविष्य में पेट्रोल-डीजल की निर्भरता को पूरी तरह खत्म कर सकती है, स्विट्जरलैंड के ETH Zurich के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सौर मिनी-रिफाइनरी सिस्टम विकसित किया है, जो किसी जादुई मशीन की तरह हवा और सूरज की रोशनी को सीधे लिक्विड फ्यूल (तरल ईंधन) में बदल देता है।
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कैसे होता है यह चमत्कार?
इस तकनीक में बिजली की जरुरत नहीं पड़ती, बल्कि यह सौर तापीय ऊर्जा (Solar Thermal Energy) पर काम करती है पूरी प्रक्रिया तीन मुख्य चरणों में सिमटी है:
- हवा से कच्चा माल: सबसे पहले हवा से कार्बन डाइऑक्साइड और पानी के कणों को निकाला जाता है।
- सौर रिएक्टर का पावर: एक विशाल दर्पण धूप को केंद्रित कर रिएक्टर में 1,500 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी पैदा करता है, इस तापमान पर CO2 और पानी टूटकर ‘सिनगैस’ (Syngas) में बदल जाते हैं।
- ईंधन का निर्माण: अंत में इस गैस को लिक्विड फॉर्म में प्रोसेस किया जाता है, जिससे पेट्रोल, केरोसिन या मेथनॉल प्राप्त होता है।
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पर्यावरण के लिए ‘वरदान’
इस ईंधन की सबसे बड़ी खूबी इसका ‘कार्बन न्यूट्रल’ होना है, वैज्ञानिकों का दावा है कि यह ईंधन जलते समय उतना ही कार्बन छोड़ता है जितना इसे बनाने के दौरान हवा से सोखा गया था, इससे ग्लोबल वार्मिंग पर लगाम लगेगी।
हवाई जहाजों के लिए गेमचेंजर
विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक विशेष रूप से विमानन क्षेत्र (Aviation Sector) के लिए मील का पत्थर साबित होगी, क्योंकि विमानों के लिए बैटरी का उपयोग करना फिलहाल कठिन है, ETH Zurich की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, अब इस तकनीक को Synhelion जैसी कंपनियों के जरिए औद्योगिक स्तर पर उतारने की तैयारी चल रही है।







