
भारत तेजी से उस मुकाम की ओर बढ़ रहा है, जहाँ “ऊर्जा आत्मनिर्भरता” सिर्फ़ एक सपना नहीं, बल्कि वास्तविकता बनने जा रही है। 2026 तक भारत का लक्ष्य है सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन को साथ लाकर एक ऐसा मॉडल तैयार करना, जो न केवल पर्यावरण के अनुकूल हो बल्कि आर्थिक रूप से भी सशक्त बनाए।
1. ग्रीन हाइड्रोजन
कल्पना कीजिए कि आप सूरज की रोशनी और हवा की ताकत से बिजली ही नहीं, बल्कि “ईंधन” भी बना सकते हैं! यही है ग्रीन हाइड्रोजन। जब पानी को (H2O) सोलर या विंड एनर्जी के ज़रिए विभाजित कर उसमें से हाइड्रोजन को अलग किया जाता है, तो इस प्रक्रिया को इलेक्ट्रोलिसिस कहते हैं। जो हाइड्रोजन इसमें बनती है, वह पूरी तरह कार्बन-फ्री होती है यानि कोई प्रदूषण नहीं, कोई उत्सर्जन नहीं।
ग्रीन हाइड्रोजन को “भविष्य की स्वच्छ बैटरी” भी कहा जा रहा है, क्योंकि यह न केवल ऊर्जा स्टोर कर सकती है बल्कि जरूरत पड़ने पर बिजली और ईंधन दोनों के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है।
2. क्यों यह कॉम्बो गेम चेंजर है
(a) सौर ऊर्जा का परफ़ेक्ट साथी
सौर ऊर्जा केवल दिन में उपलब्ध होती है। लेकिन अगर इस ऊर्जा से हाइड्रोजन बनाया जाए, तो उसे Energy Storage Medium की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे रात या बादलों के समय भी बिजली बनाई जा सकती है, यानी 24×7 स्वच्छ ऊर्जा संभव है।
(b) भारी उद्योगों का समाधान
भारत के स्टील, सीमेंट और फर्टिलाइज़र जैसे उद्योग अब तक कोयला और नेचुरल गैस पर निर्भर हैं। ग्रीन हाइड्रोजन इसमें ईंधन का बेहतरीन विकल्प बनकर प्रदूषण को काफी हद तक कम कर सकता है।
(c) विदेशी तेल पर निर्भरता घटेगी
भारत अपने तेल का लगभग 85% आयात करता है। लेकिन अगर देश अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए सौर ऊर्जा और हाइड्रोजन पर निर्भर हो जाए, तो ऊर्जा आत्मनिर्भर भारत (Energy Independent India) का सपना साकार हो सकता है।
3. भारत के महत्वाकांक्षी कदम
भारत सरकार ने 2023 में एक ऐतिहासिक पहल की राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)।
इस मिशन के तीन मुख्य लक्ष्य हैं:
- हर साल 5 मिलियन टन (MMT) ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन।
- भारत को दुनिया का सबसे कम लागत वाला हाइड्रोजन उत्पादक देश बनाना।
- और इससे सालाना 50 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाना।
सरकार का मानना है कि भारत के पास पर्याप्त धूप, भूमि और तकनीकी क्षमता है, जो इसे इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व तक पहुंचा सकती है।
4. आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ
ग्रीन हाइड्रोजन सिर्फ पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी वरदान साबित होगी।
- रोजगार के नए अवसर:
अनुमान है कि 2030 तक इस क्षेत्र में लगभग 6 लाख नई नौकरियां पैदा होंगी, इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और इंस्टॉलेशन के क्षेत्र में। - विदेशी मुद्रा की बचत:
तेल और गैस पर निर्भरता घटने से भारत अरबों डॉलर की बचत कर सकेगा, जो देश की अर्थव्यवस्था को और मजबूत बनाएगा। - नेट ज़ीरो की दिशा में बड़ा कदम:
2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को पाने में यह तकनीक अहम भूमिका निभाएगी।
5. भारत के औद्योगिक दिग्गजों की बड़ी भूमिका
इस स्वच्छ ऊर्जा की रेस में भारत के कई उद्योगपति कूद पड़े हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज, अदाणी ग्रुप और एनटीपीसी जैसी दिग्गज कंपनियां इलेक्ट्रोलाइज़र प्लांट्स और सौर पार्क में अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं।
इनकी कोशिश है कि भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए ग्रीन हाइड्रोजन का सस्ता और स्केलेबल सॉल्यूशन उपलब्ध कराया जा सके।
6. 2026: भारत का “ऊर्जा क्रांति” वर्ष
2026 तक भारत उन देशों में शामिल होने जा रहा है जो सौर ऊर्जा और हाइड्रोजन दोनों को एकीकृत प्रणाली के रूप में अपनाएंगे। इससे न केवल नई नौकरियाँ और इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी सौर परियोजनाओं से रोजगार और बिजली पहुंचाने में मदद होगी।
भारत धीरे-धीरे ऊर्जा आयातक से ऊर्जा निर्यातक (Energy Exporter Nation) बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है और यह परिवर्तन आने वाले दशक की सबसे बड़ी कहानी बन सकता है।






